वेनेजुएला, ईरान के बाद अब पड़ोसी देश की बारी, अमेरिका ने शुरू की तैयारी, ट्रंप के रडार पर क्यों आया यह द्वीप?
US-Cuba Conflict: डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने क्यूबा को अमेरिका की ‘आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले देशों’ की सूची में फिर से शामिल कर लिया है। ऐसा करने से क्यूबा पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लग गये हैं और अंतरराष्ट्रीय फंड मिलना काफी मुश्किल हो जाता है।
वॉशिंगटन/हवाना: वेनेजुएला को अमेरिका ने कुछ घंटे के ऑपरेशन में ही जीत लिया लेकिन ईरान उसके गले में हड्डी की तरफ फंस गया है। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने अपना नया टारगेट फिक्स कर लिया है। ट्रंप ने क्यूबा के खिलाफ बयानबाजी शुरू कर दी है और माना जा रहा है कि अमेरिका का अगला हमला क्यूबा पर हो सकता है। उन्होंने इस द्वीपीय देश को ‘नाकाम देश’ बताया है। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका पहले से ही क्यूबा के साथ बातचीत कर रहा है और जल्द ही कोई और कदम उठा सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप ने एयरफोर्स वन में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि ‘अमेरिका का मानना है कि क्यूबा कोई समझौता करने के लिए उत्सुक है।’ उन्होंने यह भी संकेत दिया कि बातचीत से या तो कोई समझौता हो सकता है या फिर वॉशिंगटन को कोई और कदम उठाना पड़ सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि क्यूबा के मामले में कोई भी बड़ा कदम उठाने से पहले ईरान के साथ चल रहा टकराव ही उनकी सबसे पहली प्राथमिकता है।
ईरान के बाद डोनाल्ड ट्रंप का अगला टारगेट क्यूबा?
ट्रंप की ये धमकी उस वक्त आई है जब क्यूबा पहले से ही एक गंभीर आर्थिक और ऊर्जा संकट में फंसा हुआ है। अमेरिका के साथ तनाव की वजह से उसका संकट और ज्यादा बढ़ चुका है। क्यूबा के राष्ट्रपति मिगुएल डियाज़-कनेल ने इस बात की पुष्टि की है कि अमेरिका के साथ बातचीत चल रही है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि इस बातचीत से दोनों देशों के बीच तनाव कम हो सकता है और देश की संप्रभुता भी सुरक्षित रहेगी। लेकिन वॉशिंगटन ने यह संकेत दिया है कि दोनों देशों के संबंधों में किसी भी तरह का सुधार, क्यूबा के अंदर होने वाले बड़े राजनीतिक और आर्थिक बदलावों पर ही निर्भर करेगा।
इसका मतलब यह है कि अगर बातचीत नाकाम रहती है तो डोनाल्ड ट्रंप क्यूबा के खिलाफ मिलिट्री ऑपरेशन की इजाजत दे सकते हैं। हालांकि सवाल ये उठ रहे हैं कि जब अमेरिका पहले से ही मिडिल ईस्ट में उलझा हुआ है तो फिर अचानक क्यूबा उनकी नजर में कैसे आ गया है? दरअसलस दोनों देशों के बीच दशकों से तनाव बना हुआ है और डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के पड़ोसी देशों में अमेरिका के वर्चस्व को फिर से बनाना चाहते हैं। क्यूबा जैसे देशों में दशकों से रूस और चीन का गहरा प्रभाव रहा है और अमेरिका के लिए इसे खतरा कहा जाने लगा है।
डोनाल्ड ट्रंप क्यों क्यूबा को बना सकते हैं अगला शिकार?
- क्यूबा के फिर से चर्चा में आने की एक वजह यह है कि ईरान पर हमला करने से पहले ही क्यूबा डोनाल्ड ट्रंप की रडार पर रहा है। ईरान में युद्ध भले चल रहा है लेकिन अमेरिकी अधिकारी इस द्वीप पर लगातार दबाव बढ़ा रहे हैं।
- डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने क्यूबा को अमेरिका की ‘आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले देशों’ की सूची में फिर से शामिल कर लिया है। ऐसा करने से क्यूबा पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लग गये हैं और अंतरराष्ट्रीय फंड मिलना काफी मुश्किल हो जाता है।
- अमेरिका ने क्यूबा के खिलाफ व्यापार, यात्रा और वित्तीय लेन-देन पर लगी पाबंदियों को और भी सख्त कर दिया है, जिससे क्यूबा की अर्थव्यवस्था और भी ज़्यादा अलग-थलग पड़ गई है।
- ट्रंप का मकसद क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार पर दबाव बढ़ाना है ताकि वो अमेरिका से समझौता करने पर मजबूर हो। चीन से अपने करीबी संबंध खत्म करे। क्यूबा ईंधन भोजन और बिजली की भारी कमी से जूझ रहा है और वो अमेरिकी दबाव को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है।
क्यूबा में कितना खराब आर्थिक संकट है?
क्यूबा दशकों के अपने सबसे बुरे आर्थिक संकटों में से एक का सामना कर रहा है। उसके पास ईंधन काफी कम है और देश में बिजली कटौती से लोग परेशान हैं। लोगों को भोजन संकट का भी सामना करना पड़ रहा है। क्यूबा अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से तेल भी नहीं बेच पा रहा है जिससे उसकी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। इसने देश में रोजमर्रा के जीवन को अस्तव्यस्त कर दिया है। बिगड़ते हालात की वजह से जगह-जगह विरोध प्रदर्शन भी शुरू हो गए हैं और लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है, जिससे मिगुएल डियाज़-कनेल की सरकार पर और ज्यादा दबाव पड़ रहा है।
क्यूबा को लेकर ट्रंप की रणनीति क्या होने की संभावना है?
ट्रंप दुनियाभर में कम्युनिस्ट सरकारों पर दबाव बना रहे हैं। क्यूबा हमेशा से अमेरिका के लिए सिरदर्द और संवेदनशील रहा है। क्यूबा ने लंबे समय से उन सरकारों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखे हैं जो अमेरिका के खिलाफ रहे हैं खासकर वेनेजुएला के साथ। हवाना और काराकास ने इस क्षेत्र में अमेरिकी नीतियों का दशकों से भारी विरोध किया है और एक दूसरे को कूटनीतिक रूप से समर्थन किया है।
इन गठबंधनों और क्यूबा की उसकी वामपंथी विचारधारा की वजह से वाशिंगटन में नीति-निर्माता अक्सर इस द्वीप को लैटिन अमेरिका में अमेरिका-विरोधी गुट के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में देखते हैं। इसलिए क्यूबा पर बढ़ता दबाव उस नेटवर्क को कमजोर करने और अपने घर के करीब अमेरिकी प्रभाव को फिर से स्थापित करने के एक तरीके के रूप में देखा जाता है।
चीन और रूस से क्यूबा के संबंध कैसे रहे हैं?
अमेरिकी अधिकारियों ने आरोप लगाया है कि क्यूबा, रूस और चीन जैसे देशों से जुड़ी विदेशी खुफिया एजेंसियों को अपने क्षेत्र से काम करने दे रहा है जो अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी के लिए खतरनाक है। अमेरिका अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कोई भी कदम उठाने के लिए कुख्यात रहा है। वॉशिंगटन ने यह दावा भी किया है कि क्यूबा की सरकार ऐसे समूहों और सरकारों के साथ संबंध रखती है जिन्हें अमेरिकी हितों के लिए शत्रुतापूर्ण माना जाता है।
- अमेरिकी इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स (2025-26) में दावा किया गया है कि चीन ने क्यूबा में इलेक्ट्रॉनिक जासूसी केंद्र का विस्तार किया है। यहां से चीन अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी सैन्य अड्डों की रेडियो फ्रीक्वेंसी और सैटेलाइट कम्युनिकेशंस को ट्रैक कर सकता है। ट्रंप प्रशासन में इसको लेकर भारी गुस्सा है।
- अक्टूबर 2025 में रूस की संसद ने क्यूबा के साथ एक नए रक्षा सहयोग समझौते को मंजूरी दी थी। इसके तहत रूसी विशेषज्ञों को क्यूबा के सैन्य बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने की इजाजत दी गई। यानि रूस के सैन्य अधिकारियों की क्यूबा में मौजूदगी।
- क्यूबा को ऊर्जा संकट से बचाने चीन देश में रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में भारी भरकम निवेश कर रहा है। 2026 तक चीन ने क्यूबा में 90 से ज्यादा सोलर पार्क बनाने की प्रतिबद्धता जताई है। अमेरिका इसे अपने लिए खतरा मानता है।
- चीन ने क्यूबा को 80 मिलियन डॉलर की आपातकालीन वित्तीय सहायता भी दी है। इसके बदले में क्यूबा के मारिएल पोर्ट जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में चीनी कंपनियों का दखल बढ़ गया है। इससे अमेरिका का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच चुका है।
क्यूबा, अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच वर्षों तक चले शीत युद्ध के केन्द्र में रह चुका है। क्यूबा मिसाइल संकट को भला कौन भूल सकता है। 1959 में फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में हुई क्यूबा क्रांति के बाद यह द्वीप तत्कालीन सोवियत संघ के पाले में चला गया था। जबकि क्रांति से पहले तक क्यूबा के वाशिंगटन के साथ घनिष्ठ राजनीतिक और आर्थिक संबंध थे। लेकिन कास्त्रो के सत्ता में आने के बाद देश में अमेरिका के स्वामित्व वाले व्यवसायों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। अमेरिका ने इसके जवाब में आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए और क्यूबा को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग कर दिया और यहीं से अमेरिका और क्यूबा के बीच दुश्मनी की नींव रखी गई थी। पहले यहां सिर्फ सोवियत संघ/रूस खिलाड़ी था लेकिन अब चीन भी एक बड़ी ताकत बन चुका है।
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