March 16, 2026
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हरीश राणा का वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब हटाना…जजों ने पलट डाले पूर्व CJI चंद्रचूड़, दीपक मिश्रा के फैसलों के पन्ने, दिल छू लेगी यह कहानी

Harish Rana Passive Euthanasia Process: हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया दिए जाने की मंजूरी देने वाले सुप्रीम कोर्ट के दोनों जजों जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने बेहद संवेदनशील तरीके से हर पहलू पर विचार किया। वो भावुक भी हुए, मगर अपने फैसले से पहले पूर्व सीजेआई दीपक मिश्रा और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के निर्णयों की कसौटी पर कसा। मंडे मोटिवेशन में जानते हैं फैसले की दिल छू लेने वाली कहानी।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के दो जजों जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने भावुक होने के बाद भी बेहद तार्किक और संवेदनशील तरीके से करीब 13 साल से कोमा में रह रहे हरीश राणा को इच्छामृत्यु की मंजूरी दी। दोनों जजों ने इस मंजूरी से पहले देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण के पैसिव इच्छामृत्यु के बारे में दिए गए उनके फैसलों के पन्ने भी पलट डाले और 338 पेज के अपने फैसले में कहीं कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। मंडे मोटिवेशन में जानते हैं इन दोनों जजों की फैसला लिखने से पहले की दिल छू लेने वाली कहानी।

दोनों जजों ने एक्टिव और पैसिव यूथेनेशिया में समझाया फर्क

  • सुप्रीम कोर्ट के जज जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने अपने फैसलों में कहा है कि संविधान पीठ ने भी एक्टिव यूथेनेशिया को एक पॉजिटिव एक्ट माना है, जिसमें घातक इंजेक्शन देना या दवा देना शामिल है, जो मृत्यु का कारण बन सकते हैं या मौत की ओर ले जा सकते हैं।
  • वहीं, पैसिव इच्छामृत्यु में सीधे तौर पर प्रक्रिया में शामिल नहीं होता है। इसमें मृत्यु देने की प्रक्रिया में सीधे तौर पर दखल नहीं दिया जाता है। मुख्य रूप से इसमें मेडिकल ट्रीटमेंट या मेडिकल उपकरणों का हटाया जाना शामिल होता है। इसमें वेंटिलेटर हटाना या फीडिंग ट्यूब हटाने जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं।

पूर्व CJI दीपक मिश्रा की यह थी महत्वपूर्ण टिप्पणी

  • जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की इस बारे में टिप्पणी पर भी विचार किया। जस्टिस दीपक मिश्रा ने एक फैसले में कहा था कि यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु का मूल अर्थ रोगी या डॉक्टरों द्वारा किसी भी प्रत्यक्ष कार्य का न होना है।
  • सक्रिय इच्छामृत्यु में रोगी के जीवन को समाप्त करने के लिए एक विशिष्ट प्रत्यक्ष कार्य किया जाता है, जबकि निष्क्रिय इच्छामृत्यु में, रोगी के जीवन को बचाने के लिए आवश्यक कोई कार्य नहीं किया जाता है।

जस्टिस एके सीकरी ने पैसिव यूथेनेशिया के बारे में यह कहा

  • जस्टिस एके सीकरी ने अपने एक फैसले में इस बारे में यह तार्किक व्याख्या की है। जस्टिस एके सीकरी ने कहा था कि दो तरीके हैं-पहला है सक्रिय इच्छामृत्यु, जिसमें मृत्यु की दवाएं दी जाती हैं। सक्रिय इच्छामृत्यु में चिकित्सक-सहायता प्राप्त आत्महत्या भी शामिल है, जिसमें इंजेक्शन या दवाएं चिकित्सक द्वारा दी जाती हैं। लेकिन दवा लेने का काम मरीज खुद करता है।
  • निष्क्रिय इच्छामृत्यु तब होती है जब डॉक्टर जीवन रक्षक उपचार नहीं देते हैं या ऐसे रोगियों को जीवन रक्षक उपचार से हटा देते हैं। इसमें जीवन रक्षक मशीनों या फीडिंग ट्यूबों को डिस्कनेक्ट करना, जीवन रक्षक ऑपरेशन न करना या जीवन बढ़ाने वाली दवाएं न देना शामिल हो सकता है…।

डॉ. डीवाई चंद्रचूड़ ने भी बताया था

डॉ. डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि सक्रिय इच्छामृत्यु से मतलब मृत्यु की गति बढ़ाने में सकारात्मक योगदान से है। निष्क्रिय इच्छामृत्यु का अर्थ है कि उन चरणों को छोड़ देने से है जो अन्यथा जीवन को बनाए रख सकते थे। यहां निष्क्रिय शब्द का इस्तेमाल चिकित्सा उपचार को वापस लेने या रोकने के लिए किया गया है।

जस्टिस अशोक भूषण ने क्या कहा था

जस्टिस अशोक भूषण ने अपने एक फैसले में कहा था कि चिकित्सा उपचार को रोकना या बंद करना…इन शब्दों से पता चलता है कि यह एक ऐसा कार्य है जो सुखद मृत्यु की ओर ले जाता है। इस क्रिया को इच्छामृत्यु के रूप में परिभाषित करने के लिए कुछ सकारात्मक कार्य आवश्यक है।

जस्टिस दीपक मिश्रा ने पैसिव इच्छामृत्यु को किया साफ

जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि जब किसी मरीज की मृत्यु जीवन रक्षक उपायों को हटाने की वजह बनती है तो मरीज की मृत्यु किसी अंतर्निहित घातक बीमारी से होती है। इसमें डॉक्टर का कोई दखल नहीं होता है। वहीं, सक्रिय इच्छामृत्यु के दायरे में आने वाले मामलों में मरीज को घातक दवाएं दी जाती हैं। यानी उसकी मृत्यु उस दवा के कारण होती है।

जस्टिस चंद्रचूड़ के फैसले ने दूर कर दी दुविधा

जस्टिस चंद्रचूड़ ने साफ तौर पर कहा कि जीवन समाप्त करने वाले सकारात्मक चिकित्सीय हस्तक्षेप (जैसे घातक इंजेक्शन) और रोगी को कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली पर न रखने के निर्णय के बीच गुणात्मक अंतर है, जिससे जीवन कृत्रिम रूप से लंबा नहीं होता। पहला जीवन का असमय अंत कर देता है। दूसरा जीवन के अंत को उसके प्राकृतिक अंत बिंदु से आगे नहीं बढ़ाता।

माता-पिता का दुख पूरी तरह से नहीं मिटेगा, कम जरूर होगा

  • फैसले में कहा गया है कि ये दुविधा पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ के सामने भी आई थी, जिसमें कहा गया था कि एक्टिव और पैसिव यूथनेशिया में फर्क को समझना जरूरी है। दोनों जजों ने अपने फैसले में कहा कि इस आदेश के लागू होने से हरीश के माता-पिता का दुख पूरी तरह से मिट नहीं जाएगा।
  • हालांकि, हरीश की स्थिति के कारण उन्हें जो कष्ट झेलना पड़ रहा है, वह कम से कम समाप्त हो जाएगा। हालांकि, निर्णय इस पहलू पर आधारित नहीं है और हरीश के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए लागू कानूनी सिद्धांतों के आधार पर दिया गया है। फिर भी इस कठोर वास्तविकता को नजरअंदाज करना बहुत ही नासमझी होगी।

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